आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

मंगलवार, 23 मार्च 2010

शत शत नमन!

आईये देश के वीर सपूत भगत सिंह, राजगुरु व सुकदेव को साथ साथ उन सभी क्रांतिकरियो को श्रद्धा सुमन अर्पित करें और उन्ही कि तरह कुछ निर्णायक करने कि ओर कदम बढ़ाएं.
और एक साथ कहें
वन्दे मातरम!
रत्नेश त्रिपाठी

सोमवार, 15 मार्च 2010

भारतीय नववर्ष क्यों मनाएं!

भारतवर्ष वह पावन भूमि है जिसने सम्पूर्ण भ्रह्माण्ड को अपने ज्ञान से आलोकित किया है, इसने जो ज्ञान का निदर्शन प्रस्तुत किया है, वह केवल भारतवर्ष में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का पोषक है. यहाँ संस्कृति का प्रत्येक पहलू प्रकृति और विज्ञान का ऐसा विलक्षण उदाहरण है जो कहीं और नहीं मिलता. नए वर्ष का आरम्भ अर्थात भारतीय परंपरा के अनुसार 'वर्ष प्रतिपदा' भी एक ऐसा ही विलक्षण उदाहरण है.
भारतीय कालगणना के अनुसार इस पृथ्वी के सम्पूर्ण इतिहास की कुंजी मन्वंतर विज्ञान में है. इस ग्रह के सम्पूर्ण इतिहास को 14 भागों अर्थात मन्वन्तरों में बांटा गया है. एक मन्वंतर की आयु 30 करोण 67 लाख और 20 हजार वर्ष होती है. इस पृथ्वी का सम्पूर्ण इतिहास 4 अरब 32 करों वर्ष का है. इसके 6 मन्वंतर बीत चुके हैं. और 7 वां वैवश्वत मन्वंतर चल रहा है. हमारी वर्त्तमान नवीन सृष्टि 12 करोण 5 लाख 33 हजार 1 सौ चार वर्ष की है. ऐसा युगों की कालगणना बताती है. पृथ्वी पर जैव विकास का सम्पूर्ण काल 4 ,32 ,00 ,00 .00 वर्ष है. इसमे बीते 1 अरब 97 करोण 29 लाख 49 हजार 1 सौ 11 वर्ष के दीर्घ काल में 6 मन्वंतर प्रलय, 447 महायुगी खंड प्रलय तथा 1341 लघु युग प्रलय हो चुके हैं. पृथ्वी और सूर्य की आयु की अगर हम भारतीय कालगणना देखें तो पृथ्वी की शेष आयु 4 अरब 50 करोण 70 लाख 50 हजार 9 सौ वर्ष है तथा पृथ्वी की सम्पूर्ण आयु 8 अरब 64 करोण वर्ष है. सूर्य की शेष आयु 6 अरब 66 करोण 70 लाख 50 हजार 9 सौ वर्ष तथा इसकी सम्पूर्ण आयु 12 अरब 96 करोण वर्ष है.
विश्व की सभी प्राचीन कालगणनाओ में भारतीय कालगणना प्राचीनतम है.इसका प्रारंभ पृथ्वी पर आज से प्रायः 198 करोण वर्ष पूर्व वर्त्तमान श्वेत वराह कल्प से होता है. अतः यह कालगणना पृथ्वी पर प्रथम मनावोत्पत्ति से लेकर आज तक के इतिहास को युगात्मक पद्धति से प्रस्तुत करती है. काल की इकाइयों की उत्तरोत्तर वृद्धि और विकास के लिए कालगणना के हिन्दू विशेषज्ञों ने अंतरिक्ष के ग्रहों की स्थिति को आधार मानकर पंचवर्षीय, 12 वर्षीय और 60 वर्षीय युगों की प्रारंभिक इकाइयों का निर्माण किया. भारतीय कालगणना का आरम्भ सूक्ष्मतम इकाई त्रुटी से होता है, इसके परिमाप के बारे में कहा गया है कि सुई से कमल के पत्ते में छेद करने में जितना समय लगता है वह त्रुटी है. यह परिमाप 1 सेकेण्ड का 33750 वां भाग है. इस प्रकार भारतीय कालगणना परमाणु के सूक्ष्मतम ईकाई से प्रारंभ होकर काल कि महानतम ईकाई महाकल्प तक पहुंचती है.
पृथ्वी को प्रभावित करने वाले सातों गृह कल्प के प्रारंभ में एक साथ एक ही अश्विन नक्षत्र में स्थित थे. और इसी नक्षत्र से भारतीय वर्ष प्रतिपदा (भारतीय नववर्ष ) का प्रारंभ होता है. अर्थात प्रत्येक चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथमा को भारतीय नववर्ष प्रारंभ होता है. जो वैज्ञानिक द्रष्टि के साथ-साथ सामाजिक व सांस्कृतिक संरचना को प्रस्तुत करता है. भारत में अन्य संवत्सरो का प्रचलन बाद के कालों में प्रारंभ हुआ जिसमे अधिकांश वर्ष प्रतिपदा को ही प्रारंभ होते हैं. इनमे विक्रम संवत महत्वपूर्ण है. इसका आरम्भ कलिसंवत 3044 से माना जाता है. जिसको इतिहास में सम्राट विक्रमादित्य के द्वारा शुरू किया गया मानते हैं. इसके विषय में अकबरुनी लिखता है कि ''जो लोग विक्रमादित्य के संवत का उपयोग करते हैं वे भारत के दक्षिणी व पूर्वी भागो में बसते हैं.''
इसके अतिरिक्त कुछ जो अन्य महत्वपूर्ण बातें इस दिन से जुडी हैं, वो निम्न हैं :

* इसी दिन भगवान श्रीराम जी का रावण वध के पश्चात् राज्याभिषेक हुआ था.
* प्रभु श्रीराम जी के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व उत्सव मनाने का प्रथम दिन है.
* माँ शक्ति (दुर्गा माँ) की उपासना की नवरात्री का शुभारम्भ भी इसी पावन दिन से होता है.
* झुलेलाल का जन्म भी भारतीय मान्यताओं के अनुसार वर्ष प्रतिपदा को माना जाता है.
* आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती जी के द्वारा आर्य समाज कि स्थापना इसी दिन की गयी.
* सिक्ख परंपरा के द्वितीय गुरु अंगद देव का जन्म भी इसी पावन दिन हुआ.
* इसी दिन युधिष्ठिर का राज्याभिषेक (युगाब्द ५११२ वर्ष पूर्व) हुआ.
* विक्रमादित्य ने इसी दिन हूणों को परास्त कर भारत में हिन्दू राज्य स्थापित किया.
* विश्व के सबसे बड़े सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डा. केशव राम बलिराम हेडगेवार जी का जन्म इसी पावन दिन हुआ था. इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी भारतीय नववर्ष उसी नवीनता के साथ देखा जाता है. नए अन्न किसानो के घर में आ जाते हैं, वृक्ष में नए पल्लव यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी अपना स्वरूप नए प्रकार से परिवर्तित कर लेते हैं. होलिका दहन से बीते हुए वर्ष को विदा कहकर नवीन संकल्प के साथ वाणिज्य व विकास की योजनायें प्रारंभ हो जाती हैं . वास्तव में परंपरागत रूप से नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही प्रारंभ होता है. अतः आप सभी को भारतीय नववर्ष 2067 , युगाब्द 5112 व पावन नवरात्रि की शुभकामनाएं
* रत्नेश त्रिपाठी

भारतीय नववर्ष क्यों मनाएं!

भारतवर्ष वह पावन भूमि है जिसने सम्पूर्ण भ्रह्माण्ड को अपने ज्ञान से आलोकित किया है, इसने जो ज्ञान का निदर्शन प्रस्तुत किया है, वह केवल भारतवर्ष में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का पोषक है. यहाँ संस्कृति का प्रत्येक पहलू प्रकृति और विज्ञान का ऐसा विलक्षण उदाहरण है जो कहीं और नहीं मिलता. नए वर्ष का आरम्भ अर्थात भारतीय परंपरा के अनुसार 'वर्ष प्रतिपदा' भी एक ऐसा ही विलक्षण उदाहरण है.
भारतीय कालगणना के अनुसार इस पृथ्वी के सम्पूर्ण इतिहास की कुंजी मन्वंतर विज्ञान में है. इस ग्रह के सम्पूर्ण इतिहास को 14 भागों अर्थात मन्वन्तरों में बांटा गया है. एक मन्वंतर की आयु 30 करोण 67 लाख और 20 हजार वर्ष होती है. इस पृथ्वी का सम्पूर्ण इतिहास 4 अरब 32 करों वर्ष का है. इसके 6 मन्वंतर बीत चुके हैं. और 7 वां वैवश्वत मन्वंतर चल रहा है. हमारी वर्त्तमान नवीन सृष्टि 12 करोण 5 लाख 33 हजार 1 सौ चार वर्ष की है. ऐसा युगों की कालगणना बताती है. पृथ्वी पर जैव विकास का सम्पूर्ण काल 4 ,32 ,00 ,00 .00 वर्ष है. इसमे बीते 1 अरब 97 करोण 29 लाख 49 हजार 1 सौ 11 वर्ष के दीर्घ काल में 6 मन्वंतर प्रलय, 447 महायुगी खंड प्रलय तथा 1341 लघु युग प्रलय हो चुके हैं. पृथ्वी और सूर्य की आयु की अगर हम भारतीय कालगणना देखें तो पृथ्वी की शेष आयु 4 अरब 50 करोण 70 लाख 50 हजार 9 सौ वर्ष है तथा पृथ्वी की सम्पूर्ण आयु 8 अरब 64 करोण वर्ष है. सूर्य की शेष आयु 6 अरब 66 करोण 70 लाख 50 हजार 9 सौ वर्ष तथा इसकी सम्पूर्ण आयु 12 अरब 96 करोण वर्ष है.
विश्व की सभी प्राचीन कालगणनाओ में भारतीय कालगणना प्राचीनतम है.इसका प्रारंभ पृथ्वी पर आज से प्रायः 198 करोण वर्ष पूर्व वर्त्तमान श्वेत वराह कल्प से होता है. अतः यह कालगणना पृथ्वी पर प्रथम मनावोत्पत्ति से लेकर आज तक के इतिहास को युगात्मक पद्धति से प्रस्तुत करती है. काल की इकाइयों की उत्तरोत्तर वृद्धि और विकास के लिए कालगणना के हिन्दू विशेषज्ञों ने अंतरिक्ष के ग्रहों की स्थिति को आधार मानकर पंचवर्षीय, 12 वर्षीय और 60 वर्षीय युगों की प्रारंभिक इकाइयों का निर्माण किया. भारतीय कालगणना का आरम्भ सूक्ष्मतम इकाई त्रुटी से होता है, इसके परिमाप के बारे में कहा गया है कि सुई से कमल के पत्ते में छेद करने में जितना समय लगता है वह त्रुटी है. यह परिमाप 1 सेकेण्ड का33750 वां भाग है. इस प्रकार भारतीय कालगणना परमाणु के सूक्ष्मतम ईकाई से प्रारंभ होकर काल कि महानतम ईकाई महाकल्प तक पहुंचती है.
पृथ्वी को प्रभावित करने वाले सातों गृह कल्प के प्रारंभ में एक साथ एक ही अश्विन नक्षत्र में स्थित थे. और इसी नक्षत्र से भारतीय वर्ष प्रतिपदा (भारतीय नववर्ष ) का प्रारंभ होता है. अर्थात प्रत्येक चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथमा को भारतीय नववर्ष प्रारंभ होता है. जो वैज्ञानिक द्रष्टि के साथ-साथ सामाजिक व सांस्कृतिक संरचना को प्रस्तुत करता है. भारत में अन्य संवत्सरो का प्रचलन बाद के कालों में प्रारंभ हुआ जिसमे अधिकांश वर्ष प्रतिपदा को ही प्रारंभ होते हैं. इनमे विक्रम संवत महत्वपूर्ण है. इसका आरम्भ कलिसंवत 3044 से माना जाता है. जिसको इतिहास में सम्राट विक्रमादित्य के द्वारा शुरू किया गया मानते हैं. इसके विषय में अकबरुनी लिखता है कि ''जो लोग विक्रमादित्य के संवत का उपयोग करते हैं वे भारत के दक्षिणी व पूर्वी भागो में बसते हैं.''
इसके अतिरिक्त कुछ जो अन्य महत्वपूर्ण बातें इस दिन से जुडी हैं, वो निम्न हैं :

* इसी दिन भगवान श्रीराम जी का रावण वध के पश्चात् राज्याभिषेक हुआ था.
* प्रभु श्रीराम जी के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व उत्सव मनाने का प्रथम दिन है.
* माँ शक्ति (दुर्गा माँ) की उपासना की नवरात्री का शुभारम्भ भी इसी पावन दिन से होता है.
* झुलेलाल का जन्म भी भारतीय मान्यताओं के अनुसार वर्ष प्रतिपदा को माना जाता है.
* आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती जी के द्वारा आर्य समाज कि स्थापना इसी दिन की गयी.
* सिक्ख परंपरा के द्वितीय गुरु अंगद देव का जन्म भी इसी पावन दिन हुआ.
* इसी दिन युधिष्ठिर का राज्याभिषेक (युगाब्द ५११२ वर्ष पूर्व) हुआ.
* विक्रमादित्य ने इसी दिन हूणों को परास्त कर भारत में हिन्दू राज्य स्थापित किया.
* विश्व के सबसे बड़े सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डा. केशव राम बलिराम हेडगेवार जी का जन्म इसी पावन दिन हुआ था. इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी भारतीय नववर्ष उसी नवीनता के साथ देखा जाता है. नए अन्न किसानो के घर में आ जाते हैं, वृक्ष में नए पल्लव यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी अपना स्वरूप नए प्रकार से परिवर्तित कर लेते हैं. होलिका दहन से बीते हुए वर्ष को विदा कहकर नवीन संकल्प के साथ वाणिज्य व विकास की योजनायें प्रारंभ हो जाती हैं . वास्तव में परंपरागत रूप से नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही प्रारंभ होता है.
अतः आप सभी को भारतीय नववर्ष 2067 , युगाब्द 5112 व पावन नवरात्रि की शुभकामनाएं
* रत्नेश त्रिपाठी

शनिवार, 13 मार्च 2010

जबाब ढूंढ़ते कुछ ज्वलंत प्रश्न

हमारे मित्र श्री अश्वनी मिश्र जी ने कुछ सवाल मेल के द्वारा मेरे ऊपर दाग दिया और उन प्रश्नों जा जबाब माँगा, उनके प्रश्न को हुबहू प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिनका जबाब मिलना ही चाहिए,प्रश्न हैं ;-
आपका निर्णय
 अफजल गुरू देशभक्त है, भगत सिंह व साध्वी आतंकवादी है।
 सिमी, इंडियन मुजाइद्दीन समाज सेवा में लगे संगठन है, वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विष्व हिन्दू परिषद आतंकवादी संगठन है।
 गोधरा-कांड एक दुघर्टना है, गुजरात दंगे सुनियोजित हैं।
 15 प्रतिशत मुसलमान इंसान है, 85 प्रतिशत हिन्दू कूड़ा-कचरा हैं।
 मालेगांव धमाके ही सच्चे धमाके हैं, अन्य जगहों पर हुए धमाके दिवाली के पटाखे हैं।
 मालेगांव में 5 मुसलमानों की मौत बहुत बड़ी घटना है, दूसरे स्थलों पर सहस्रों की संख्या में मौत के शिकार हिन्दू केकड़े हैं।
 मुसलमानों के लिए आरक्षण, हिन्दुओं के लिए धमाके।
 हज के लिए करोड़ो रूपये, अमरनाथ यात्रा के लिए फूटी कौड़ाी नहीं।
 इस्लामी आतंकवाद का समर्थन धर्मनिरपेक्षता है, भारतीय को मारना देशप्रेम हैं।
 बाबरी ढ़ांचे का गिराया जाना एक मुद्दा है, सैकड़ौं हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त करना विकास कार्य है।
 मुसलमान की मौत मृत्यु है, हिन्दू की मौत नियति हैं।
 हिन्दुओं को नियमों का पालन करना चाहिए, मुसलमानों के लिए कोई नियम नहीं।
 अल्लाह परमेश्वर है, राम एक काल्पनिक पात्र है।
 क्या यह हमारे सपनों का भारत हैं।
वाकई क्या ये हमारे सपनों का भारत है ?
रत्नेश त्रिपाठी

रविवार, 7 मार्च 2010

नाम खोजती एक कविता

तुझको कैसे बतलाये हम, जाने क्या-क्या भूल गए,
तेरी आँखे याद रही बस, तेरा चेहरा भूल गए .

हँसना अपनी फितरत है, सो हँस कर आंसू पीते हैं,
तेरी खातिर कितना तडपे, तुझे बताना भूल गए.

कल तक तुझको मिल जाएगी, चिट्ठी डाल के सोचा था
घर पहुंचे तो याद आया, पता तो लिखना भूल गए .

हमने सबकी प्यास बुझाई, सबको जीवन दान दिया,
सब खुश थे अपनी मस्ती में, मेरी तृष्णा भूल गए.

कुछ दिनों पहले सड़क पे चलते हुए एक फटा सा कागज का टुकड़ा मिला, ये सोचकर की ये पैरों से रौंदा जा रहा है अतः इसे उठाकर किनारे करने की सोची तभी उस टुकड़े पर इस अधूरी कविता को पाया, मैंने इसके रचयिता के बारे में अपने सभी शुभचिंतको से पूछा लेकिन पता नहीं चला, सो इसकी आखिरी डेढ पंक्ति को अपने से पूरा किया. अभी भी इसके रचयिता के नाम का इंतजार है.

रत्नेश त्रिपाठी

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

हमारी प्राचीनता और विश्व

विगत 19-20 फरवरी 2010 को दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी हुयी, विषय था '' पूर्वी उत्तर प्रदेश का पुरातात्विक गौरव'' इतिहास का शोधार्थी होने और सेमिनार की व्यवस्था की दृष्टि से मुझे विश्वविद्यालय द्वारा बुलाया गया, इस सेमिनार में देश भर से आये इतिहासकारों और विद्वानों ने वर्त्तमान में हो रहे शोधों के नवीन प्रकाश में तथ्यों पर अपने-अपने विचार रखे, इनमे जो महत्वपूर्ण बातें सामने आयीं उससे हर भारतीय दुनिया के सामने अपने गौरव को बताते हुए यह कह सकता है कि, जब विश्व में अन्य जगहों पर लोगों का जन्म ही नहीं हुआ था, उस समय भारत में धान कि खेती होती थी, हम ही हैं जिन्होंने इस धरा पर सर्वप्रथम अन्न उपजाया.
इस संगोष्ठी से जो मुख्य बातें निकलकर सामने आयीं वो निम्न हैं :-

* यह कि अभी तक सबसे प्राचीन धान कि खेती का प्रमाण चीन से मिला था लगभग 3000 BCE लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश ले लहुरादेवा नामक स्थान से हुयी खुदाई से प्राप्त चावल कि डेट 8000 BCE मानी गयी है (यहाँ उन अक्ल के अंधों को मै बता दूँ जो खाते इस देश का हैं लेकिन बोलते आक्सफोर्ड कि भाषा है! इस चावल का परीछण भारत और बिदेश दोनों जगह एक साथ हुआ और डेट 8000 BCE निकली)

* इस हिसाब से हम इस विश्व में सबसे प्राचीन अन्न उत्पादक हैं. अब उन तथाकथित विद्वानों को भी इस खोज से चक्कर आ गया है और ये (शायद इनको बामपंथी या यूरोपीय विचारधारा का कहा जाता है ) इसे नई कहानी से जोड़ रहे हैं और कह रहे हैं कि चीन कि मुंडा जाति ने इसे भारत में लाया, अब इन्हें कौन समझाए कि 3000 में और 8000में 5000 वर्षों का फासला है . इस संगोष्ठी में इन बेहूदा विचारों कि भर्तष्ना की गयी.

* सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि एक मत से सभी विद्वानों ने यह माना कि हमें उन पुराने यूरोपीय तरीकों को छोड़कर भारतीय दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में तथ्यों को (पुरातात्विक साक्ष्यों) उपनिषदों तथा वेदों में वर्णित बातों सा सामंजस्य बैठाना चाहिए ताकि सही इतिहास लिखा जा सके. क्योंकि जिन वेदों को गड़ेरियों का लिखा गीत (हमारे सम्माननीय प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी भी ) ये तथाकथित विद्वान् मानते रहे वह आज एक एक कर वैज्ञानिक तथ्य बनते जा रहे हैं.

रत्नेश त्रिपाठी

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

सभी ब्लागर भाईयों को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं

सभी ब्लागर भाईयों को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं!
ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम !
उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्योर्मुर्क्षीय मामृतात !!
ॐ नमः शिवाय

साथ ही साथ इस देश की युवा पीढ़ी जो अपने जीवन मूल्य भूलकर केवल सवार्थी प्यार की खातिर वेलेंटाईन डे जैसे त्यौहार मनाते हैं उनका विरोध न करते हुए यही कहना चाहता हूँ कि,

अपने प्यार का ये आधार होना चाहिए
प्रेमिका के साथ पूरा परिवार होना चाहिए

रत्नेश त्रिपाठी