आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

शनिवार, 11 जुलाई 2009

वो माँ थी !

जब सृजन हुआ तुम्हारा
नवजीवन हुआ तुम्हारा
तो इसके लिए समर्पित
कौन थी? वो माँ थी

जब पहला आहार मिला
जब पहला प्यार मिला
उसके लिए लालायित

कौन थी? वो माँ थी
जब कदम हुए संतुलित

पहले थे गिरते-पड़ते विचलित
पल-पल जिसने संभाला
वो कौन थी ? वो माँ थी

जब तुमको पिता ने डाटा
जब पैर में चुभा कांटा
आँचल में छिपाकर, जिसने दर्द को बांटा
वो कौन थी ? वो माँ थी

हर सुख में हर दुःख
में जीवन की कठिन राहों पर
गिर-गिरकर उठना सिखाया
वो कौन थी? वो माँ थी

हम नौजवान हो गए आज
हम बुद्धिमान हो गए आज
हमें याद रहा सबकुछ सिवाय जिसके
वो कौन थी ? वो माँ थी

तानो को सहा जिसने
उफ़ तक भी किया, जिसने
जिसने ममता का कर्ज भी न माँगा
वो कौन थी ? वो माँ थी

तुम याद करो खुद को
क्या थे अब क्या बन बैठे
जो बदली नहीं एक तृण भी
वो कौन थी ? वो माँ थी
" सिर्फ व सिर्फ माँ थी "

रत्नेश त्रिपाठी

रविवार, 21 जून 2009

हे पिता

एक दिन मै एक विद्धाश्रम में गया, वहां देखा उन पिताओं को जिनके भी जीवित पुत्र व पुत्रियाँ हैं। उनको पैदा करने व पालते समय ये कभी नहीं सोचे होंगे की एक दिन जब हम उनकी तरह पालने योग्य होंगे तो वे हमें बहार का रास्ता दिखा देंगे। हम माँ बाप जो बच्चों को पालते समय उनकी खुशी की खातिर अपनी सारी खुशियों को उनपर न्यौछावर कर देते हैं वही बेटे व बेटियाँ अपनी आधुनिक कही जाने वाली जिंदगी में हमें समाहित नहीं कर पाएंगे।
लेकिन कमाल की बात है वे चिल्ड्रेन डे मानते हैं लेकिन आज के ये आधुनिक बेटे जो साल में एक दिन फादर दे मनाने वाले हैं वे उनकी सुधि भी नहीं लेते। वो तो भला हो उस अंग्रेजन का जिसने १९१० में आपने पिता की याद में पहली बार फादर डे मनाया जिसे आज सारी दुनिया मनाती है, हे आधुनिक लोंगो उसने अपने पिता का जन्मदिन फादर डे के रूप में मनाया क्योंकि वे मर चुके थे। तुम उसके पिता के गम में क्यों फादर डे मानते हो, अगर अपने पिता से इतना ही प्यार है तो हर रोज उनकी देखभाल करो उनको अपने साथ रखो तो उनके लिए हर रोज फादर डे होगा।
मै किसी भी त्यौहार का विरोधी नहीं हूँ लेकिन मै उन त्योहारों को नकारता हूँ जो हमारी उज्जवल संस्कृति के खिलाफ हैं, हमारे हर रिश्ते इतने अनमोल है की उनके लिए साल में सिर्फ एक दिन मनाना उन रिस्तो को गाली देने के सामान है। यैसे में माता पिता का रिश्ता तो देव तुल्य रिश्ता है, हम ये कैसे मान सकते हैं की रोज मंदिर में जाकर भगवान की पूजा करें और घर में माँ बाप को साल में एक दिन याद के रूप में मनावें और ये सोचे की भगवान हमसे प्रसन्न होंगे। जिस तरह हम कण कण में व्याप्त भगवान को रोज मन्दिरों में पूजते है ठीक उसी तरह अपने घर में माँ बाप के रूप में मौजूद भगवान की पूजा करें, ये मदर डे व फादर डे उन अंग्रेजों को ही मनाने दें जिनके लिए ये रिश्ते साल में एक दिन का खेल हैं।
रत्नेश त्रिपाठी

शनिवार, 9 मई 2009

हे माँ

आज मै तुम्हे याद करूँगा क्योंकि आज मदर डे है, आज मै तुमको तोहफे में कुछ दूंगा क्योकि आज मदर डे है, आज मै तुमसे समय निकाल कर मिलूँगा क्योंकि आज मदर डे है, साल में एक बार ही सही मै तुम्हारे बारे में सोचूंगा क्योंकि आज मदर डे है.
दैनिक जागरण जो भारत का अग्रणी समाचार पत्र है उसके दिल्ली संस्करण मे सम्माननीया शिल्पा शूद जी का एक लेख छपा है, मै उनकी विचारों को क्या कहूँ ये उनकी गलती नहीं है. उन्होंने लिखा है कि आपको मम्मी से कितना प्यार है? कितनी खास हैं माँ आप के लिए? मदर्स दे पर तोहफा देकर आप साबित कर सकते हैं कि माँ से बड़ा कोई नहीं,( कमाल है! अब बाजारू तोहफे माँ को माँ साबित करेंगे) उन्होंने आगे लिखा है आखिर माँ ही है जो बच्चों को खुश देखने कि खातिर सारे जतन करती है. ऐसे मे बच्चों का भी यह फर्ज बनता है कि इस तेज रफ्तार जिंदगी मे से एक दिन निकालकर उन्हें दें. शिल्पा जी ने शायद माँ को उन नेताओं कि सड़क पर लगी मूर्ति समझ लिया है जिनपर साल भर कबूतर व कौए गन्दा करते हैं और साल मे एक दिन कोई नेता उन्हें साफ करवाकर नयी माला पहनाता है और उन्हें याद करके अपना फर्ज निभाता है और फिर उसे उसके जीवन पर्यंत चलने वाले हाल पर छोड़ देता है.
क्या इतना उतावलापन किसी भारतीय के लिए माँ के प्रति साल में एक ही दिन रहता है, क्या हम माँ को साल में एक दिन याद रखने वाली मूर्ति समझते हैं कि उसे साफ किया और कुछ नये मालाओं से सजाकर फिर किसी ओट पर रख दिया कि अगले साल फिर उसे मदर डे पर उठाऊंगा और वही काम पूरा करके माँ के कर्ज को अदा कर दूंगा.
हमारी नई दुनिया में जीने वाले आधुनिक भारतीयों ये हमारी परंपरा नही है, क्योकि माँ हमारे सर्वश्व मे निवास करती है वह हमारे जीवन के हर क्षण मे हमारे साथ रहती है, पूरा जीवन हम उसकी सेवा करके भी उसके कर्ज को नही उतार पाते तो साल मे एक दिन याद करके हम क्या कर लेंगे अरे जो लोग अपनी माँ को अपने साथ नहीं रखते या भूल जाते हैं वे लोग मदर डे मनावें. हम तो भारतीय हैं हमारी तो दिन की शुरुआत ही माँ के चरणों से होती है इसीलिए हमारा हर दिन मदर डे होता है.
हमें पश्चिम से ये सीखने की नहीं बल्कि उनको ये सिखाने की जरुरत है कि हम अपने रिश्तों कि मार्केटिंग नहीं करते और न ही उनको साल मे केवल एक दिन मनाते हैं बल्कि हमारे हर रिश्ते हमारे जीवन कि अनमोल कडिया होते हैं जिनकी माला हम हर पल अपने ह्रदय से लगाये रहते हैं.

रविवार, 29 मार्च 2009

माँ की वंदना

यूँ तो माँ के विषय में लिखने के लिए एक ही जनम काफी नहीं है, लेकिन अगर कुछ लिखने को कहा जाये तो अभिव्यक्ति के लिए शब्द ही नहीं मिलते हाँ कुछ पंक्तियों से जरुर माँ के बारे में वंदना स्वरूप शब्द का वर्णन किया जा सकता है, इसी संदर्भ में कुछ पंक्तियाँ निम्न हैं ,

१. बुलंदियों का बड़े से बड़ा निशान हुआ,
उठाया गोंद में माँ ने तो आसमान छुआ,
२. जब भी कस्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,
माँ दुआ कराती हुई ख्वाब में आ जाती है.
३. घर के झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उघडते देखे,
चुपके-चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा .
४. बदन से तेरे आती है मुझे यै माँ वही खुशबू,
जो इक पूजा के दीपक में पिघलते घी से आती है.
५. भीड़ भरा चौरस्ता हूँ मै,
घर की एक डगर है माँ.
रहा उम्र भर एक सफ़र में,
जब भी लौटा घर है माँ.
मुझको छोड़ अकेला मेरे,
बच्चे चले गए जब से,
तेरी याद बहुत आती है,
आया तुझे छोड़कर माँ.
ये सभी पंक्तियाँ किसी न किसी ने माँ को याद करते हुए ही लिखी होगी, मतलब इससे नहीं की वो किस जाति या धर्म के हैं! बात ये है की उन सभी ने माँ को इश्वर के रूप में देखा होगा, पद्म भूषण नीरज जी ने माँ के बारे में लिखा है कि,

जिसमे खुद भगवान ने खेले खेल विचित्र,
माँ कि गोंदी से नहीं कोई तीर्थ पवित्र.

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

भारतीय नववर्ष २०६६,

सभी ब्लागरवासियों को भारतीय नववर्ष २०६६, कलियुगाब्द ५०११ व नवरात्रि की अनुपम बेला पर ढेर सारी शुभकामनाएं,

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

स्लम कौन, डाग कौन और मिलेनियेर कौन?

सर्वप्रथम देशवासियों को (उन्हें जो आस्कर मिलाने से प्रसन्न हैं ) बधाई. आज वह सभी देसवासी जिन्हें आस्कर का महत्व समझ में आता है, खुश हैं. आज भारत की सरकार भी खुश है, आज पूरा सदन एक साथ खुश है क्योंकि उन्हें भी आस्कर एवार्ड का महत्व समझ में आता है. लेकिन मैं खुश नहीं हूँ (जिसका सायद ही समाज पर असर पड़े) क्योंकि मैं अभी तक इस फिल्म के शीर्षक से भारतीय समाज का तादात्म्य स्थापित नहीं कर पा रहा हूं. क्योंकि मुझे आस्कर से अधिक हमारे देश का वह नागरिक महत्वपूर्ण लगता है जिसके नंगेपन को उघाड़कर यह अवार्ड जीता गया.

क्या इसके पहले भारत में फिल्में नहीं बनी जिसने भारतीय संस्कृति को उजागर नहीं किया, उन्हें अवार्ड क्यों नहीं मिला? क्योंकि यूरोप हमें तीसरी दुनिया ( यह हमारे लिए गाली है) मनाता है यैसे में वह हमारी संस्कृति के अच्छे रूप को कैसे अवार्ड दे सकता है.मेरी यैसी कोई दुर्भावना नहीं है की हमें क्यों आस्कर अवार्ड मिला, बल्कि मैं यही विचार कर रहा हूं कि क्या यह अवार्ड इस फिल्म को मिला है? या कि इसके आड़ में भारत कि गरीबी को सामने लाकर एक गाली दी गयी है.

जब मै (एक आम आदमी) एक आम आदमी के बारे में व इस अवार्ड के बीच तादात्म्य बैठा रहा था तो मुझे अपने देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभाद्यक्ष व सारे सदन का वक्तव्य मुझे अन्दर से झकझोर रहा था. हमारे राष्ट्रपति जी ने कहा कि इस अवार्ड ने पुरे देश का मन बढाया है. पधानमंत्री जी ने भी कहा कि फिल्म कि पूरी टीम ने भारत का सम्मान बढाया है हम सभी को उनपर गर्व है.विश्व समुदाय( यूरोपीय देश) की इस अप्रत्यक्ष गाली रूपी अवार्ड पर हमारे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व पुरे सदन को गर्व है, तो क्या उन्हें भारत की गरीबी पर खुद पर शर्म नहीं आणि चाहिए. क्या उन्हें यह नहीं दिखता की जिस पठकथा पर यह अवार्ड मिला है वह भारत के गरीबी के नंगेपन को उजागर करता है. मुझे लगता है कि इनसे अच्छे वे यूरोपीय है जिसने भारत में आकर यहीं के लोंगो के साथ मिलकर हमारी समृद्धि कि पोल खोल दी. और हम अवार्ड के नामपर अपने ही लोगों कि दुर्दशा पर खुश हो रहें हैं. इससे मुझे एही लगता है कि स्लम हम(आम नागरिक), डॉग हमारे देश के नेता व मिलेनियर वह यूरोपीय है जिसने हमको हमसे ज्यादा सही समझा, और स्लम डॉग मिलेनियर बनाकर हमें ही गाली देकर हमें ही खुश कर दिया.

रविवार, 15 फ़रवरी 2009

यूज एंड थ्रो

आज अगर हम स्थायित्व की बात करें तो हमें अच्छी सोच वाला कहा जायेगा, जबकि अच्छी सोच कहने वाला खुद नहीं जानता की स्थायित्व क्या होता है, चलिए हम इस बात को यैसे समझते हैं की, कभी समय था की हम कलम और दवात का प्रयोग करते थे, जिसमे कम खर्चे में भी स्थायित्व होता था। हम एक ही कलम से सालों लिखते थे और एक दवात स्याही महीनों चलती थी. यैसे में यूज अधिक होता था और थ्रो कम होता था. समय बदला हम आधुनिक हुए (आधुनिकता की एक परिभाषा मेरी दृष्टि में यह भी है की यह अपनी मौत की तरफ भागने के लिए प्रेरित करता है), और कलम दवात की जगह रिफिल वाली बालपेन ने ले लिया उससे और आधुनिक हुए तो जेल पेन आया. आज स्थिति यह है की यह आधुनिकता पैसे को भी बर्बाद कर रही है और यूज की कम थ्रो की पद्धति अधिक विक्सित कर रही है, वर्त्तमान में मनुष्य की भी यही दशा है, वह भी अपने रिश्तों को यूज एंड थ्रो की तरह ही समझता है और अपने को आधुनिक कहता है इतना ही नहीं वह स्थायित्व की बात भी करता है, यैसे में यदि इस आधुनिक विचारधारा की तुलना करें तो स्थायित्व यूज एंड थ्रो के साथ इस आधुनिक युग में संभव नहीं दिखता. मानवीय जीवन में इसके अनेक उदाहरण हमें देखने को मिलते हैं. आज हम प्यार किसी और से करते हैं और शादी किसी और से यहाँ भी यूज एंड थ्रो, हम शादी के बाद अकेले रहना चाहतें है लेकिन समस्या आने पर माँ बाप याद आते हैं फिर उसके बाद अकेले. माँ बाप के साथ भी यूज एंड थ्रो, दूसरी पसंद आने पर पत्नी से तलाक यहाँ भी यूज एंड थ्रो, और जाने कितने उदहारण है. आज कोई भी किसी भी वस्तु को अधिक दिनों तक आपने पास नहीं रखना चाहता क्योंकि वह आधुनिक है और यूज एंड थ्रो पर विस्वास करता है. इसी लिए हमारे देश में भी साल में एक बार सभी को याद करने का त्यौहार मनाया जाने लगा है, मदर डे, फादर डे, सिस्टर डे, वेलेनटाइन डे, ब्रदर डे, फ्रैंडशिप डे, आदि आदि. क्योंकि अब हमारे पास समय नहीं रहा हम आधुनिक हो गए हैं और यूज एंड थ्रो से काम चला रहे हैं.