आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

शनिवार, 13 मार्च 2010

जबाब ढूंढ़ते कुछ ज्वलंत प्रश्न

हमारे मित्र श्री अश्वनी मिश्र जी ने कुछ सवाल मेल के द्वारा मेरे ऊपर दाग दिया और उन प्रश्नों जा जबाब माँगा, उनके प्रश्न को हुबहू प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिनका जबाब मिलना ही चाहिए,प्रश्न हैं ;-
आपका निर्णय
 अफजल गुरू देशभक्त है, भगत सिंह व साध्वी आतंकवादी है।
 सिमी, इंडियन मुजाइद्दीन समाज सेवा में लगे संगठन है, वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विष्व हिन्दू परिषद आतंकवादी संगठन है।
 गोधरा-कांड एक दुघर्टना है, गुजरात दंगे सुनियोजित हैं।
 15 प्रतिशत मुसलमान इंसान है, 85 प्रतिशत हिन्दू कूड़ा-कचरा हैं।
 मालेगांव धमाके ही सच्चे धमाके हैं, अन्य जगहों पर हुए धमाके दिवाली के पटाखे हैं।
 मालेगांव में 5 मुसलमानों की मौत बहुत बड़ी घटना है, दूसरे स्थलों पर सहस्रों की संख्या में मौत के शिकार हिन्दू केकड़े हैं।
 मुसलमानों के लिए आरक्षण, हिन्दुओं के लिए धमाके।
 हज के लिए करोड़ो रूपये, अमरनाथ यात्रा के लिए फूटी कौड़ाी नहीं।
 इस्लामी आतंकवाद का समर्थन धर्मनिरपेक्षता है, भारतीय को मारना देशप्रेम हैं।
 बाबरी ढ़ांचे का गिराया जाना एक मुद्दा है, सैकड़ौं हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त करना विकास कार्य है।
 मुसलमान की मौत मृत्यु है, हिन्दू की मौत नियति हैं।
 हिन्दुओं को नियमों का पालन करना चाहिए, मुसलमानों के लिए कोई नियम नहीं।
 अल्लाह परमेश्वर है, राम एक काल्पनिक पात्र है।
 क्या यह हमारे सपनों का भारत हैं।
वाकई क्या ये हमारे सपनों का भारत है ?
रत्नेश त्रिपाठी

रविवार, 7 मार्च 2010

नाम खोजती एक कविता

तुझको कैसे बतलाये हम, जाने क्या-क्या भूल गए,
तेरी आँखे याद रही बस, तेरा चेहरा भूल गए .

हँसना अपनी फितरत है, सो हँस कर आंसू पीते हैं,
तेरी खातिर कितना तडपे, तुझे बताना भूल गए.

कल तक तुझको मिल जाएगी, चिट्ठी डाल के सोचा था
घर पहुंचे तो याद आया, पता तो लिखना भूल गए .

हमने सबकी प्यास बुझाई, सबको जीवन दान दिया,
सब खुश थे अपनी मस्ती में, मेरी तृष्णा भूल गए.

कुछ दिनों पहले सड़क पे चलते हुए एक फटा सा कागज का टुकड़ा मिला, ये सोचकर की ये पैरों से रौंदा जा रहा है अतः इसे उठाकर किनारे करने की सोची तभी उस टुकड़े पर इस अधूरी कविता को पाया, मैंने इसके रचयिता के बारे में अपने सभी शुभचिंतको से पूछा लेकिन पता नहीं चला, सो इसकी आखिरी डेढ पंक्ति को अपने से पूरा किया. अभी भी इसके रचयिता के नाम का इंतजार है.

रत्नेश त्रिपाठी

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

हमारी प्राचीनता और विश्व

विगत 19-20 फरवरी 2010 को दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में एक राष्ट्रीय संगोष्ठी हुयी, विषय था '' पूर्वी उत्तर प्रदेश का पुरातात्विक गौरव'' इतिहास का शोधार्थी होने और सेमिनार की व्यवस्था की दृष्टि से मुझे विश्वविद्यालय द्वारा बुलाया गया, इस सेमिनार में देश भर से आये इतिहासकारों और विद्वानों ने वर्त्तमान में हो रहे शोधों के नवीन प्रकाश में तथ्यों पर अपने-अपने विचार रखे, इनमे जो महत्वपूर्ण बातें सामने आयीं उससे हर भारतीय दुनिया के सामने अपने गौरव को बताते हुए यह कह सकता है कि, जब विश्व में अन्य जगहों पर लोगों का जन्म ही नहीं हुआ था, उस समय भारत में धान कि खेती होती थी, हम ही हैं जिन्होंने इस धरा पर सर्वप्रथम अन्न उपजाया.
इस संगोष्ठी से जो मुख्य बातें निकलकर सामने आयीं वो निम्न हैं :-

* यह कि अभी तक सबसे प्राचीन धान कि खेती का प्रमाण चीन से मिला था लगभग 3000 BCE लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश ले लहुरादेवा नामक स्थान से हुयी खुदाई से प्राप्त चावल कि डेट 8000 BCE मानी गयी है (यहाँ उन अक्ल के अंधों को मै बता दूँ जो खाते इस देश का हैं लेकिन बोलते आक्सफोर्ड कि भाषा है! इस चावल का परीछण भारत और बिदेश दोनों जगह एक साथ हुआ और डेट 8000 BCE निकली)

* इस हिसाब से हम इस विश्व में सबसे प्राचीन अन्न उत्पादक हैं. अब उन तथाकथित विद्वानों को भी इस खोज से चक्कर आ गया है और ये (शायद इनको बामपंथी या यूरोपीय विचारधारा का कहा जाता है ) इसे नई कहानी से जोड़ रहे हैं और कह रहे हैं कि चीन कि मुंडा जाति ने इसे भारत में लाया, अब इन्हें कौन समझाए कि 3000 में और 8000में 5000 वर्षों का फासला है . इस संगोष्ठी में इन बेहूदा विचारों कि भर्तष्ना की गयी.

* सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि एक मत से सभी विद्वानों ने यह माना कि हमें उन पुराने यूरोपीय तरीकों को छोड़कर भारतीय दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में तथ्यों को (पुरातात्विक साक्ष्यों) उपनिषदों तथा वेदों में वर्णित बातों सा सामंजस्य बैठाना चाहिए ताकि सही इतिहास लिखा जा सके. क्योंकि जिन वेदों को गड़ेरियों का लिखा गीत (हमारे सम्माननीय प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी भी ) ये तथाकथित विद्वान् मानते रहे वह आज एक एक कर वैज्ञानिक तथ्य बनते जा रहे हैं.

रत्नेश त्रिपाठी

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

सभी ब्लागर भाईयों को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं

सभी ब्लागर भाईयों को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं!
ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम !
उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्योर्मुर्क्षीय मामृतात !!
ॐ नमः शिवाय

साथ ही साथ इस देश की युवा पीढ़ी जो अपने जीवन मूल्य भूलकर केवल सवार्थी प्यार की खातिर वेलेंटाईन डे जैसे त्यौहार मनाते हैं उनका विरोध न करते हुए यही कहना चाहता हूँ कि,

अपने प्यार का ये आधार होना चाहिए
प्रेमिका के साथ पूरा परिवार होना चाहिए

रत्नेश त्रिपाठी

सोमवार, 18 जनवरी 2010

शिर्डी, त्रयम्बकेश्वर व महाकालेश्वर की पावन यात्रा का वृतांत

दिल्ली की जानलेवा ठण्ड में बने इस कार्यक्रम ने जीवन को नए अनुभवों से अवगत कराया, वैसे तो तीर्थयात्राएँ इसी उम्र में बहुत कर ली है, लेकिन इस तीर्थयात्रा का अपना अलग ही महत्व समझ में आया.
11 जनवरी को हम कपकपाती ठण्ड से निकलकर टीशर्ट में गर्मी का अनुभव करते हुए शिर्डी साईं बाबा के दरबार में पहुचे, इस तीर्थ का एक सबसे बड़ा अनुभव यह हुआ कि अगर आप किसी बिशेष अवसर पर वहाँ नहीं गए हैं तो आप को कोई भी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा, ना ठगे जाने का डर नहीं असुरछा की भावना बाबा का दर्शन करके मन में एक अजीब सा उत्साह का अनुभव हुआ, हम पढ़े लिखे लोगों की यह बहुत बड़ी कमी है की हम हर जगह तर्क की कसौटी पर चीजों को तौलते हैं लेकिन यदि मन को इन तर्कों से अलग करके ध्यान लगाया जाये तो वाकई एक अलग सा उत्साह हमें भक्तिरस से सरोबार कर देता है, जिसका अनुभव हमें शिर्डी साईं बाबा के दरबार में हुआ,
रात वहीँ बिताकर हम अगले दिन शिगनापुर पहुचे जो शिर्डी से लगभग 80 कि. मी दूर है. यह वही जगह है जहाँ घरों में ताले नहीं लगाते , लोग झूठ नहीं बोलते , यहाँ पर प्रसिद्ध शनि भगवान का मंदिर है, जिनके दर्शन कि एक अलग ही पहचान है, वह यह कि उनका दर्शन केवल पूरी तरह नंगे होकर भीगे शारीर के साथ ही करना होता है, महिलाओं को इसकी बाध्यता नहीं है किन्तु पुरुषों को मात्र एक बिना सिले हुए कपडे
को लपेट कर ही दर्शन करने कि अनुमति दी जाती है. शनि भगवान का दर्शन कर हमने उत्तम जीवन कि कामना की,
लेकिन हमें तब आश्चर्य हुआ जब वहाँ के लोगों को प्रसड के नाम पर यात्रियों को लूटते हुए देखा, आज के समय में ताले न लगाने वाले लोग लालच की दलदल में किस तरह फस चुके हैं इसका बड़ा ही अजीब उदहारण देखने को मिला. लेकिन भगवान के दर्शन अच्छे से हुए इसी ख़ुशी में हम वहाँ से नासिक पहुंचे.

नासिक में हम मुक्तिधाम में रुके यह ठहरने कि एक उत्तम जगह है, जहाँ आपको मंदिर के शुद्ध वातावरण के साथ साथ ठगे जाने का भय नहीं रहता. अगले दिन हम नासिक से त्रयम्बकेश्वर गए जो नासिक से ८० कि.मी. की दुरी पर है भगवान शंकर के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में महत्वपूर्ण त्रयम्बकेश्वर भोलेनाथ के दर्शन पाकर हम कृतार्थ हुए. तत्पश्चात हम नासिक पहुंचे, अपने यात्रा का अगला पड़ाव था, उज्जैन,

ठीक सूर्यग्रहण के दिन हम भोपाल से ॐ नमः शिवाय का जप करते हुए मोक्ष के समय छिप्रा नदी के तट पर पहुंचे. वहाँ स्नान करने के लिए लोगों का मेला लगा था. और नारी पुरुष पर संवाद करने वालों के लिए वह दृश्य किसी शिक्षा ग्रहण करने से कम नहीं था. वहाँ सभी भक्तिरस में डूबे स्नान कर रहे थे. क्या नारी क्या पुरुष सभी सबके अन्दर केवल और केवल भक्ति थी और वास्तव में यही हमारे हिन्दू सनातन धर्म की विशेषता है, कि जहाँ हमने भगवान को पूजा वहाँ हमें आनंद मिला और जहाँ हमने वासना कि पूजा कि वहाँ हमें दुःख व कष्ट मिला. छिप्रा नदी के पावन जल से स्नान करने के बाद हमने महाकाल के दर्शन किये. दर्शन करते समय ऐसा लग रहा था कि हम किसी अलग ही दुनिया में आ गए हैं, इस पावन मौके पर छिप्रा नदी में स्नान और महाकाल के दर्शन ने हमें खुद को गौरवान्वित करते हुए भावविभोर कर दिया जिसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता.
और इस तीर्थयात्रा का समापन राजा भोज के बनाये हुए भोजपुर के शिव मंदिर के दर्शन से हुआ. भोपाल से ३० कि.मी. कि दुरी पर स्थित इस शिव मंदिर एक बड़ी ही रोचक कथा है, ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर को बनाने का कम एक ही रात में पूरा होना था जो संभव नहीं हो सका, पुनः इसे पूरा करने का बहुत ही प्रयास हुआ किन्तु विफल रहा, भगवान भोलेनाथ के इस विशालकाय शिवलिंग के दर्शन के साथ ही इस पावन तीर्थयात्रा की समाप्ति हुयी.
ॐ नमः शिवाय
रत्नेश त्रिपाठी

शनिवार, 2 जनवरी 2010

उस दिन मेरे गीतों का त्यौहार मनाया जायेगा

जिस दिन वेद मन्त्रों से धरती को सजाया जायेगा
उस दिन मेरे गीतों का त्यौहार मनाया जायेगा

खेतों में सोना उपजेगा, झूमेगी डाली -डाली
वीरानों कि कोख से पैदा जिस दिन होगी हरियाली
विधवाओं के सूने मस्तक पर फहरेगी जब लाली,
निर्धन कि कुटिया में जिस दिन दीप जलाया जायेगा
उस दिन.......

खलिहानों कि खाली झोली, भर जाएगी मेहनत से
इंसानों कि मज़बूरी जब, टकराएगी दौलत से ,
सदियों का मासूम लड़कपन जाग उठेगा गफलत से,
जिस दिन भूखे बच्चों को भूखा न सुलाया जायेगा .
उस दिन ...............

जिस दिन काले बाजारों में, रिश्वतखोर नहीं होंगे ,
जिस दिन मदिरा के सौदाई तन के चोर नहीं होंगे,
जिस दिन सच कहने वालों के दिल कमजोर नहीं होंगे
जिस दिन झूठी रश्मों को नीलम कराया जायेगा .
उस दिन ..............

यह गीत हमारी शाखा के हैं जिसे हम जनवरी भर बच्चों के साथ गायेंगे और इस देश कि उन्नति के बारे में खेल खेल में चर्चा करेंगे. मुझे लगा कि हम सब को इसे गाना चाहिए, और केवल गानाही क्यों इसके भों को समझकर अपने प्रयास भी करने चाहिए, इस कारण से मने इसे प्रस्तुत किया.
रत्नेश त्रिपाठी

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

इसे पढ़े जरुर? क्योंकि मुझे अपने सवालों का जबाब चाहिए!

नव वर्ष
जहाँ तक मै जानता हूँ हम सभी इस देश से प्यार करते हैं, इससे प्यार करने का तर्क चाहे जो भी हो. खास करके इस ब्लाग कि दुनिया में रोजमर्रा हो रहे मेरे अनुभवों से भी मुझे यह स्पष्ट होता है कि हम आपस में चाहे कितनी ही बहस करें किन्तु देश पर मर मिटने वाले क्रांतिकारियों के नाम पर एकजुट दिखाई देते हैं.
हमारी सोच हर विषय पा खोजपरक होती है, अब बात असली मुद्दे की, कि क्या हमें यह अंग्रेजों का नववर्ष मनाना चाहिए?
मै किसी भी प्रकार का विरोध न करते हुए इस अंग्रेजों के नववर्ष को मनाने का कारण जाना चाहता हूँ! हम आधुनिक हो चुके लोग क्या यह नहीं जानते कि अमेरिका जैसा आधुनिक देश ने आजाद होने के बाद उस हर प्रतीक को मिटा के रख दिया जिसमे उसे गुलामी का प्रतीक नजर आया, क्या हम अमेरिका से अधिक (वर्त्तमान में) आधुनिक हैं.

* क्या हम ये नहीं जानते कि इसी अंग्रेजी विचारों और दासता से लड़ते-लड़ते हमारे देश के नौजवान से लेकर सभी उम्र के लोगों ने जान दी,

* क्या हम उनकी पुन्यतिथियाँ ही मनाने के लिए शेष हैं?
* इनको याद करते हुए हम लम्बे चौड़े भाषण झाड़ देते हैं, क्या जब हम इस दासता के प्रतीक को पैसे व शराब में डुबोकर मानते होंगे तो हमारी ख़ुशी के लिए मर मिटने वाली आत्माएं प्रशन्न होती होंगी?
* क्या हम पढ़े लिखे स्वतन्त्र लोग अपने नववर्ष को नहीं जानते जिसपर सारी प्रकृति टिकी है, और हम अपने सभी काम उसी के अनुसार करते हैं?
* क्या हम अपने भारतीय नव वर्ष को भी ऐसे ही मनाते हैं?

मै कोई बीता हुआ कल या आज के ज़माने कि भाषा में दकियानूसी नहीं हूँ, मै इस भारत का नौजवान हूँ और मुझे गर्व है कि मै उन महात्माओं, पुण्य आत्माओं का वंशज हूँ जिन्होंने मरना स्वीकार किया किन्तु दासता की किसी भी वस्तु को गले नहीं लगाया.
मुझे गर्व है क्या आपको है ?
रत्नेश त्रिपाठी