आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

रविवार, 23 अगस्त 2009

मै और तुम



रात यादों की झुरमुट से सपने में तुझे देखा
एक हवा की सरसराहट ने
तभी परदे को उड़ाया
उसके छुअन में मुझे तेरा आभाष हुआ
लेकिन तभी सूरज की किरणों ने
मुझे ख्वाब से हकीकत में ला पटका
मैंने फिर कोशिश की तुम्हे जागते हुए
ढूंढ़ने की इधर-उधर, हर कही,..........
आज भी वही सड़क चहल-पहल में मशगूल है
आज भी गाडियां धुवाँ उडाती वैसे ही चली जातीं हैं
आज भी मौसम वैसे ही बदलता है
सबकी अपनी-अपनी महक फिंजा में समाई है
सिवाय एक तेरे, सबकुछ वैसा ही है
सिर्फ उस घोंसले के सिवा
जिसे टूट जाने पर
चिडिया दूसरे डाल पर
बिना शिकायत के फिर उतनी ही मेहनत से
दूसरा घोंसला बनाती है, इसी उम्मीद में कि
शायद इस बार कोई अनहोनी न हो
मै भी उसी तरह तुम्हे दूसरों में ढूंढ़ता हूँ
लेकिन कोई तुझसा नहीं मिलता
जाने क्यूँ तेरी महक मुझे दूसरों से दूर कर देती है
..............तब मै थक हार कर वापस उसी बिस्तर पर
लेट जाता हूँ,
यही आशा लिए कि तुम फिर मुझे
ख्वाब में मिलोगी और मै तुम्हे फिर ख्वाब
से निकलकर हकीकत में पाने कि कोशिश करता रहूँगा
अनवरत....अविराम .......अनथक ......

रत्नेश त्रिपाठी

4 टिप्‍पणियां:

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ती |

दिगम्बर नासवा ने कहा…

रात यादों की झुरमुट से सपने में तुझे देखा ...

vaah .... bahoot hi gazabki abhivyakti hai, khwaab ki aad mein, fir sooraj ki kiran se asliyat mein jhaankte ....... khwaab mein dubaare milne ki chaah ....... sachmuch chitr ki bhanti likha hai is rachna ko apne ........ bahoot manmonak ...

Harkirat Haqeer ने कहा…

prayas achha hai ....!!

kshama ने कहा…

हाँ ...चिडिया अपने दूसरे घोंसले बना लेती है ...इंसान को बार ,बार एक नए नीड़ का निर्माण करना कठिन होता है ..ना नीड़ ना साथी..