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शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

याद आता है!

याद आता है बहुत बचपन सुहाना,
रोज बागीचे में जाने का बहाना,
प्राइमरी स्कुल में मास्टर की छड़ी
रोते बिलखते माँ के आँचल में छुप जाना
याद है अब भी वो जूठे टिकोरे
मीठा कहके औरों को जूठा खिलाना
याद है तालाब से सीपी पकड़ना
और फिर पत्थर पे उसको रगड़ना
याद है वो प्याज और मिर्चे का मिलन
सीपियों से छीलकर टिकोरे संग खाना
हम नहीं भूले वो आम के पत्ते
तोड़कर नाचती हुई पंखी बनाना
हम नहीं भूले वो जाड़े की रातें
माँ का गोंदी में उठाकर खाना खिलाना
याद है इतना की भूलते ही नहीं
काश फिर मिल जाये वो बचपन सुहाना


रत्नेश त्रिपाठी

5 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

VIJAY ARORA ने कहा…

bachpan ke din bhim kaya din the
urhte firte titli ban
bachpan..................

कमलेश वर्मा ने कहा…

हम नहीं भूले वो आम के पत्ते
तोड़कर नाचती हुई पंखी बनाना ..yatharth ki chhaya lagti hain yh panktiyan....sadhuwad

राज भाटिय़ा ने कहा…

मीठा कहके औरों को जूठा खिलाना
याद है तालाब से सीपी पकड़ना
और फिर पत्थर पे उसको रगड़ना
बहुत सुंदर जी आप ने तो पुरा बचपन ही याद दिला दिया.
धन्यवाद

दिगम्बर नासवा ने कहा…

BACHPAN KI YAADEN TO HOTI HI AISI HAIN .... UMR BHAR BHULAAYE NAHI BHOOLTI .... BAHOOT ACHHEE RACHNA HAI ...