आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

परतंत्रता का प्रतीक, न्यू इयर

यहाँ मै दैनिक जागरण में छपी पंजाब सरकार कि मंत्री लक्ष्मीकांत चावला का अंग्रेजियत नव वर्ष पर एक बहुत ही अच्छा आलेख आया है जिसे मै जस का तस प्रस्तुत कर रहा हूँ....
एक बार फिर अधिकांश भारतवासी, हमारी सरकार, हमारा टेलीविजन नववर्ष का स्वागत करने की तैयारी कर रहे हैं। बड़े-बड़े होटलों में हजारों रुपये प्रति व्यक्ति खर्च करके देश का कुलीन वर्ग सीटें रिजर्व करा रहा है। नववर्ष पर करोड़ों ग्रीटिंग कार्ड भेजे जा रहे हैं। तथाकथित सभ्य समाज जाम से जाम टकरा-खनका कर मदहोशी की हालत में नववर्ष की शुभकामनाएं देगा। आम आदमी भी पीछे नहीं रहेगा। आधी रात तक टीवी के सामने बैठ कर मध्य रात्रि के अंधेरे में ही नया दिन मनाएगा और कुछ मनचले सड़कों पर पटाखे छोड़कर, नशे में धुत होकर घर के दरवाजे खटखटाएंगे। आजादी के बाद हमने परतंत्रता के अनेक प्रतीक चिह्न मिटाए, विदेशियों के बुत हटाए, सड़कों के नामों का भारतीयकरण किया, पर संवत् और राष्ट्रीय कैलेंडर के विषय में हम सुविधावादी हो गए, हमें विस्मृति रोग ने जकड़ लिया। इसके लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि अब जब संसार के अधिकतर देशों ने समान कालगणना के लिए ईसवी सन स्वीकार कर लिया है तो दुनिया के साथ चलने के लिए हमें भी इसका प्रयोग करना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि हमने सुविधा को आधार बनाकर राष्ट्रीय गौरव से समझौता कर लिया है और यह भी भुला दिया कि काम चलाने और जश्न मनाने में बहुत अंतर है। दो हजार वर्ष पहले शकों ने सौराष्ट्र और पंजाब को रौंदते हुए अवंती पर आक्रमण किया तथा विजय प्राप्त की। विक्रमादित्य ने राष्ट्रीय शक्तियों को एक सूत्र में पिरोया और शक्तिशाली मोर्चा खड़ा करके ईसा पूर्व 57 में शकों पर भीषण आक्रमण कर विजय प्राप्त की। थोड़े समय में ही इन्होंने कोंकण, सौराष्ट्र, गुजरात और सिंध भाग के प्रदेशों को भी शकों से मुक्त करवा लिया। वीर विक्रमादित्य ने शकों को उनके गढ़ अरब में भी करारी मात दी। अरब विजय के उपलक्ष्य में मक्का में महाकाल भगवान शिव के मंदिर का निर्माण करवाया। विक्रमादित्य की अरब विजय का वर्णन अरबी कवि जरहाम किनतोई ने अपनी पुस्तक शायर उर ओकुल मंें किया है-वे लोग धन्य हैं जो सम्राट विक्रमादित्य के समय उत्पन्न हुए। वे सज्जन, उदार एवं कर्तव्यपरायण शासक थे। इसी सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर भारत में विक्रमी संवत प्रचलित हुआ। सम्राट पृथ्वीराज के शासनकाल तक इसी संवत के अनुसार कार्य चला। इसके बाद भारत में मुगलों के शासनकाल के दौरान सरकारी क्षेत्र में हिजरी सन चलता रहा। इसे भाग्य की विडंबना कहें अथवा स्वतंत्र भारत के कुछ नेताओं का अनुचित दृष्टिकोण कि सरकार ने शक संवत् को स्वीकार कर लिया, लेकिन शकों को परास्त करने वाले सम्राट विक्रमादित्य के नाम से प्रचलित संवत् को कहीं स्थान न दिया। यह सच है कि भारतवासी अपने महापुरुषों के जन्मदिन एवं त्यौहार विक्रमी संवत् की तिथियों के अनुसार ही मनाते हैं। जन्मकुंडली तथा पंचांग भी इसी आधार पर बनते हैं। उदाहरण के लिए रक्षाबंधन श्रावणी पूर्णिमा को और सर्दी का आगमन शरद पूर्णिमा को मनाते हैं। गुरुनानक देव का जन्मदिवस कार्तिक पूर्णिमा, श्रीकृष्ण का भादों की अष्टमी, श्रीरामचंद्र का चैत्र की नवमी को ही मनाया जाता है। इसी प्रकार बुद्ध पूर्णिमा, पौष सप्तमी और दीपावली के लिए कार्तिक अमावस्या सभी जानते हैं, किंतु न जाने क्यों अपनी तथा अपने बच्चों की जन्मतिथि ईसवी सन के अनुसार चलाते हैं। 31 दिसंबर की आधी रात को नववर्ष के नाम पर नाचने वाले आम जन को देखकर तो कुछ तर्क किया जा सकता है, पर भारत सरकार को क्या कहा जाए जिसका दूरदर्शन भी उसी रंग में रंगा श्लील-अश्लील कार्यक्रम प्रस्तुत करने की होड़ में लगा रहता है और राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री पूरे राष्ट्र को नववर्ष की बधाई देते हैं। भारतीय सांस्कृतिक जीवन का विक्रमी संवत् से गहरा नाता है। इस दिन लोग पूजापाठ करते हैं और तीर्थ स्थानों पर जाते हैं। लोग पवित्र नदियों में स्नान करते हैं। लोग इस दिन इन तामसी पदार्थाे से दूर रहते हैं, पर विदेशी संस्कृति के प्रतीक और गुलामी की देन विदेशी नववर्ष के आगमन से घंटों पूर्व ही मांस मदिरा का प्रयोग, श्लील-अश्लील कार्यक्रमों का रसपान तथा अन्य बहुत कुछ ऐसा प्रारंभ हो जाता है जिससे अपने देश की संस्कृति का रिश्ता नहीं है। विक्रमी संवत के स्मरण मात्र से ही विक्रमादित्य और उनके विजय अभियान की याद ताजा होती है, भारतीयों का मस्तक गर्व से ऊंचा होता है, जबकि ईसवी सन के साथ ही गुलामी द्वारा दिए गए अनेक जख्म हरे होने लगते हैं। मोरारजी देसाई को जब किसी ने पहली जनवरी को नववर्ष की बधाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया था- किस बात की बधाई? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नववर्ष से कोई संबंध नहीं। यही हम लोगों को भी समझना होगा। (लेखिका पंजाब सरकार में मंत्री हैं)

अंग्रेजियत नव वर्ष पर एक लेख मै भी लिख रहा हूँ जिसे ३० को पोस्ट करूँगा किन्तु उसके पहले इस लेख का हाल जानना है कि हमारे अन्दर कितना भारत जीवित है.
रत्नेश त्रिपाठी

12 टिप्‍पणियां:

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

आपकी बात बिल्कुल सही है पर आज के दौर में लोग उस चीज़ को ज़्यादा महत्व देते है जिधर अधिक से अधिक लोगो का झुकाव होता है चाहे उसका वास्तविकता से कोई मतलबा हो या नही..

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप से सहमत है जी

A. Arya ने कहा…

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

A. Arya ने कहा…

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

A. Arya ने कहा…

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

A. Arya ने कहा…

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

A. Arya ने कहा…

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ ..... ये हमारे देश का चलन है जो आसान हो उसको लागू करो ....... हमारे नेताओं ने भी यही किया ...... मैं मानता हूँ की इस दिन शुभकामनाएँ देने में कोई बुराई नही पर अपनी तिथिनुसार भी हमें चलना चाहिए ......

Mithilesh dubey ने कहा…

आपसे पूर्णतया सहमत हूँ ।

महाशक्ति ने कहा…

दैनिक जागरण पर पढ़ा था, आपके पास भी पढ़ा इस प्रकार की र्सा‍थक प्रस्‍तुति के लिये साघुवाद

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

31 दिसंबर की आधी रात को नववर्ष के नाम पर नाचने वाले आम जन को देखकर तो कुछ तर्क किया जा सकता है, पर भारत सरकार को क्या कहा जाए जिसका दूरदर्शन भी उसी रंग में रंगा श्लील-अश्लील कार्यक्रम प्रस्तुत करने की होड़ में लगा रहता है......

चावला जी का शुक्रिया अपने सशक्त विचारों के लिए ......!!

Renu Sharma ने कहा…

ratnesh ji,
shukriya ,
aapane mera bolg padha or sarthak pratikriya bhi di.