आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

जवानी !

लाशों का बवंडर भी जिन्हें रुला नहीं पाती,
धधकते सीने की आग समंदर भी बुझा नहीं पाती.
जब बदलाव के लिए ये नौजवान खड़े होते हैं ,
इनके पैरों को ये सियासत भी हिला नहीं पाती.

अदभुत अदम्य शाहस बलिदान जिसकी थाती,
अकल्पनीय सोच, मर जाने की परिपाटी .
बदल देता है राज खूनी, खून देकर जो अपनी ,
वो नौजवान है! जिसकी कर्जदार है ये माटी.

माँ के लिए प्यार, बहन की करे रक्षा
वो बाप की है लाठी, परिवार की सुरक्षा
लेकिन वो जान देता है इस मातृ भू की खातिर
वह नौजवान है और उसकी है यही इच्छा.

बादलों की गरज को सीने में दाब लेना.
बिजलियों की चमक को मुठ्ठी में बांध लेना
ना रोकना तुम रास्ता वह नौजवान है
आता है बिना अंगूठे का उसे लक्ष्य साध लेना.

बदल देना समाज को फितरत है हमारी
लड़ जाना शेरों से हिम्मत है हमारी
जो टूट चुके हैं उनकी बात क्या करना
हम नौजवान हैं हर बाजी है हमारी

एक जीरो पर खड़े नौजवान ने दुनिया को झुकाया
बदल देने को राज फिरंगी नौजवां ने खुद को मिटाया
ऐसे ही कितने नौजवानों ने जब वन्देमातरम गाया
तब जाकर इस देश ने वापस अपना गौरव पाया .

और अंत में ....
बदल जायेंगे सूरते हाल, जरा खुद को बदल कर देखो ,
झुक जायेगा खुद आसमां, नौजवां के साथ चलकर देखो.

रत्नेश त्रिपाठी

9 टिप्‍पणियां:

rakesh ने कहा…

बहुत जोशीला!
राकेश

sarvesh ने कहा…

बदल जायेंगे सूरते हाल, जरा खुद को बदल कर देखो ,
झुक जायेगा खुद आसमां, नौजवां के साथ चलकर देखो.
बहुत खूब.

nilesh mathur ने कहा…

waah! kya baat hai!

दिलीप ने कहा…

josh se bhari rachna bahut abhaar...
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

राज भाटिय़ा ने कहा…

माँ के लिए प्यार, बहन की करे रक्षा
वो बाप की है लाठी, परिवार की सुरक्षा
लेकिन वो जान देता है इस मातृ भू की खातिर
वह नौजवान है और उसकी है यही इच्छा.
बहुत सुंदर जी, धन्यवाद

Udan Tashtari ने कहा…

अदम्य जोशपूर्ण रचना..बहुत बढ़िया.

arvind ने कहा…

लाशों का बवंडर भी जिन्हें रुला नहीं पाती,
धधकते सीने की आग समंदर भी बुझा नहीं पाती.
जब बदलाव के लिए ये नौजवान खड़े होते हैं ,
इनके पैरों को ये सियासत भी हिला नहीं पाती....bahut badhiya....vande mataram.

ashvani ने कहा…

प्रिय मित्र
बहुत ही अच्छी रचना है आपने जवानों की जवानी को कुरेदां है | आपकी रचना पढ़कर मुझे लगा की जवानी तो सबके पास होती है उस जवानी का उपयोग हम कहाँ कर रहें है? घास की रोटी खाकर देश की अस्मिता बचाने में या मलमल की सेंज पर सो कर देश की अस्मिता को बेचने में ?
स्वान के सिर है, चरण तो चाटता है
रोटियां खायीं की साहश खा चूका
तुम न खेलो ग्राम सिंग्हों में भवानी
विश्व की अभिमान मस्तानी जवानी
अश्वनी मिश्र "राजन"

दीर्घतमा ने कहा…

priya mitra.
Namaste.
bahut krantikari kabita hai.
bahut acchha laga .apki medha nikhar rahi hai.
dhanyabad