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शनिवार, 3 अप्रैल 2010

ढोल गवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी

ढोल गवार शुद्र पशु नारी
सकल ताड़ना के अधिकारी
इसे
विवादित बनाने वाले तथाकथित वेवकूफ बुद्धिजीवीयों कि व्याख्या सत्य से कितनी दूर है वह इस मूल अर्थ सेस्पष्ट होता है.
यहाँ ताड़ना का अर्थ है पहचानना या परखना, तुलसीदास कहते हैं अगर हम ढोल के व्यवहार (सुर) को नहीं पहचातेतो उसे बजाते समय उसकी आवाज कर्कश होगी अतः उससे स्वभाव को जानना आवश्यक है इसी तरह गवारगवार का अर्थ किसी का मजाक उड़ना नहीं बल्कि उनसे है जो अज्ञानी हैं ) कि प्रकृति या व्यवहार को जाने बिनाउसके साथ जीवन सही से नहीं बिताया जा सकता ये उसके इसी तरह पशु के लिए भी अर्थ है, ठीक यही अर्थ नारीके परिप्रेक्ष में भी है, जब तक हम नारी के स्वभाव को नहीं पचानाते उसके साथ जीवन का निर्वाह अच्छी तरह से नहीं हो सकता.
इतने सुन्दर और ज्ञान रूपी इस रचना को विवादित बनना कितना बड़ा दिवालियापन है यह आसानी से समझा जासकता है . यहाँ जो ताड़ना का अर्थ पीटने या मारने का लगाया जाता है वह नितांत ही गलत है,
और सबसे बड़ी बात तुलसीदास जैसे रचनाकार को समझे बिना उनपर अनाप सनाप टिप्पड़ी देना कितना उचित हैयह समझ से परे है, इस महाकाव्य कि रचना में उनके जीवन भर कि तपस्या लगी होगी जिसका हम बिना समयलगाये कुछ बेवकूफ बुद्धिजीवियों का हवाला देकर आलोचना कर देते हैं. हम पढ़े लिखे लोगों में खोजने कि प्रवृत्तिकम और बिना सोचे समझे नक़ल करने कि प्रवृत्ति ने ही अर्थ को अनर्थ किया हुआ है. जिसका खामियाजा हमारीसनातन संस्कृति को भुगतना पड़ रहा है. और मजेदार बात तो यह है कि श्री राम के अस्तित्व को ही नकार देनेवाले तथाकथित स्यमभू देवता ही इन अनर्गल आरोपों कि झड़ी लगा रहे हैं, यैसे में एक कहानी याद आती है कि.
एक बार सोने ने लोहे से कहा कि चोट तो हम दोनों को लगती है लेकिन आवाज तुम अधिक करती हो, इसकाकारण क्या है ? इसपर लोहे ने कहा तुम दूसरे के द्वारा चोट खाती हो इसलिए दर्द कम होता है लेकिन मुझे पीटनेवाला लोहा ही होता है अतः अपने से मार खाने में दर्द अधिक होता है इसलिए मेरी कराह अधिक तेज आवाजकरती है .
ठीक यही हाल हमारा और हमारे भारतीय संस्कृति का हो गया है, समय रहते यदि हमने अपने अस्तित्व कीसच्चाई को नहीं पहचाना तो डायनासोरों कि तरह हम आपस में लड़कर ही अस्तित्वविहीन हो जायेंगे.
रत्नेश त्रिपाठी

36 टिप्‍पणियां:

दीपक भारतदीप ने कहा…

वैसे आपकी व्याख्या भी ठीक है। दरअसल रामचरित मानस में अनेक जगह व्यजंना विद्या में लिखा गया है इसलिये हर दोहे का सकारात्मक पक्ष ही लिया जाना चाहिये। अगर ताड़ना का प्रताड़ना अर्थ लिया जाये तो भी उसके उनमें सकारात्मक पक्ष है पर कम से कम पीटना शब्द तो स्वीकार्य नहीं है जैसा कि कथित बुद्धिजीवी लेते हैं। आपका ताड़ना शब्द से जांचना या परखना अर्थ लेना बहुत प्रभावपूर्ण सकारात्मक है।
दीपक भारतदीप

बेनामी ने कहा…

Bakwas puri tarah bakwas vyakhya hai.

aarya ने कहा…

बेनामी जी
लगता है आपको चोट लगी है, मेरा प्रयास आप जैसे लोग ही हैं जबकि मै जानता हूँ की अन्धो को आईना नहीं दिखाया जाता!

बेनामी ने कहा…

shambook vadh par bhi koi vyakhya kare...

मो सम कौन ? ने कहा…

रत्नेश जी, हमें तो आपकी व्याख्या ठीक लगी है।
आप अपने प्रयास जारी रखें।
आभार।

विवेक सिंह ने कहा…

पूरी चौपाई इस प्रकार है:

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥


प्रथम तो ऊपर की पंक्ति से ही स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ ताड़ना देना का मतलब सीख देना है ।
दूसरे यह तुलसीदास जी की अपनी सोच नहीं है । यह बात समुद्र ने रामजी से तब कही है जब उन्होंने उसे औकात याद दिलाई ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपकी व्याख्या सही है ...

ashvani ने कहा…

आदरणीय रत्नेश जी
सादर प्रणाम |
नारी तुम श्रद्धा हो , विश्वास भरे नग पग तल में |
पीयूष स्रोत सी बहा करो , जीवन के सुंदर समतल में
रामचरित मानस पर कोई भी प्रतिकिया करने से पहले उस चौपाई के पहले आई सभी चौपाई की ब्याख्या करना क्योकि यदि आप एक चौपाई की ब्याख्या करेगें तो शायद ही उस मूलबिंदु को स्पर्श कर पायेगें| ऐसा मेरा विश्वास है लेकिन आप ने इस चौपाई की ब्याख्या की है तो ठीक है | आज से लगभग ६-७ वर्ष पहले की एक घटना तुलसी मानस मंदिर काशी की है जहाँ पर हजार की संख्या में महिलाओं द्वारा रामचरित मानस को फाड़ा जा रहा था | इस घटना में शायद ओ लोग ही थीं जिनको इस चौपाई के अलावा और मानस की शायद कोई चौपाई याद नहीं थी मिडिया वाले भी थे | यह घटना देखकर मै बहुत ही आश्चर्य चिकित हुआ | जिस तुलसी दास ने मानस की रचना की उनके भी जीवन में एक नारी का बड़ा ही योगदान रहा है | वह इतना प्रतापित व्यक्ति क्या नारी के बारे में ऐसा लिख सकता है क्या ? जो राम के हर रूप का वर्णन अपने मानस में की हो, वह माता सीता को आर्दश की देवी मानता हो वह अपने मानस में क्या ऐसा वर्णन कर सकता है | नही .............
भाषा पर मत जाइये भाषा के भाव को समझाने का प्रयास कीजिए तुलसी दास जी ने मानस में नारी के ह्रदय का वर्णन जैसा किया है और पुरे मानस में जो नारी का चित्रण आया है वह बहुत ही सुंदर है |वास्तव में तराना का अवधी भाषा में समझाना होता है इसलिए नारी के साथ जीवन यापन करना है तो उसके व्यवहार को अच्छी तरह समझना पड़ता है (यदि पति अपने पत्नी के व्यवहार को समझ नही पाता है तो उस परिवार का क्या हाल होता है यह क्योकि सास भी कभी वहु थी धारावाहिक देखकर सबको पता चल गया है ) बहुत ही सुंदर रूप से इस चौपाई को आपने समझाने का प्रयास किया है , इस ब्याख्या को पढ़कर ह्रदय प्रसन्न हो गया आप से अनुरोध है कि ऐसे ही कुछ ज्वलंत विषयों पर इस भटकते हुए समाज को दिशा देने का प्रयास करें|
अश्वनी मिश्र "राजन"

aditya ने कहा…

uttam!

Tarkeshwar Giri ने कहा…

Ek accha prayas kiya hai aapne . Very nice.

राकेश कौशिक ने कहा…

नयी सोच के साथ सार्थक आलेख और ये उदहारण तो विशेष लगा"
"एक बार सोने ने लोहे से कहा कि चोट तो हम दोनों को लगती है लेकिन आवाज तुम अधिक करती हो, इसका कारण क्या है ? इसपर लोहे ने कहा तुम दूसरे के द्वारा चोट खाती हो इसलिए दर्द कम होता है लेकिन मुझे पीटनेवाला लोहा ही होता है अतः अपने से मार खाने में दर्द अधिक होता है इसलिए मेरी कराह अधिक तेज आवाज करती है."

कृष्ण मुरारी प्रसाद ने कहा…

अच्छी व्याख्या....
संवेदनशील प्रस्तुति......
http://laddoospeaks.blogspot.com/

Arvind Mishra ने कहा…

आर्ष ग्रन्थ साहित्य का अपने अपने ढंग से लोग व्याखाएं करते हैं,इसलिए व्याख्याओं की एक व्यासीय परम्परा भी वजूद में है -यह बहु श्रुत ,बहु विवादित अर्धाली है -
गीताप्रेस से अलग एक मूल पाठ में मानस की यही अर्धाली यूं है -
ढोल गवार क्षुद्र पशु नारी ,सकल ताड़ना के अधिकारी
ये सब पीटे जाने से ही मर्यादित / सार्थक बनते हैं -
बिना पीटे ढोल से आवाज नहीं निकलेगी
गंवार भी मारने से ही अनुशासित रहते हैं
और उसी तरह क्षुद्र पशु(कीड़े मकोड़े बिच्छू गोजर ) और क्षुद्र प्रवृत्ति की नारी भी ...
यह प्रेक्षण तुलसी का है -लोगों के दृष्टि अनुभव अलग हो सकते हैं .

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

मुझे तो दोनो व्याख्या सही लगती है

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

यह तुलसीदास का नहीं बल्कि रामचरित मानस के एक पात्र "सागर" का कथन है.

HINDU TIGERS ने कहा…

जिन लोगों का उदेश्य ही भारतीय संस्कृति को नुकसान पहुंचाने का है भला वो सही ब्याखया क्यों स्वीकार करेंगे ? आपका प्रयास बहुत अच्छा है ऐसे लोगों को सोचने पर मजबूर करने के लिए।

Sanjay Sharma ने कहा…

फ़ोन पर अपने दोस्तों को आमंत्रित
कर रहा था " आओ न यार शाम को
बंगाली मार्केट में चाट खायेंगे और
लड़कियां ताड़ेगे " येहाँ ताडने का मतलब
हम मारने-पीटने से तो नहीं न लगायेंगे .
तुलसी जी का रामायण इतना लोकप्रिय हुआ
तो जलन हुई सो जली भुनी व्याख्या परोसी
गई . अब इन गवारों को कौन समझाए
की इनके गवारेपन का इलाज मार पीट कर तो किया नहीं
गया . अब आपने देखा भाला है तरीके से ,शायद असर हो

बैरागी ने कहा…

अन्धो को आईना नहीं दिखाया जाता!

आपका प्रयास बहुत अच्छा है

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप के एक एक शव्द से सहमत हुं, बहुत सुंदर व्याख्या की आप ने धन्यवाद

दीर्घतमा ने कहा…

bahut acchhi tippni hai .bina kisi parwah ke apna karya karne ki jarurat hai .gulami ke samay bahut galat bate hamare shastro me dali ja sakti hai .
Ratnesh ji ko dhanyabad

दीर्घतमा ने कहा…

bahut acchhi tippni hai .bina kisi parwah ke apna karya karne ki jarurat hai .gulami ke samay bahut galat bate hamare shastro me dali ja sakti hai .
Ratnesh ji ko dhanyabad

Himwant ने कहा…

रामचरित मानस मे "ढोल गवार....." वाली बात किसी सन्दर्भ विशेष मे समुन्द्र ने कही है। राम कथा के किसी सुपात्र या कुपात्र ने किसी सन्दर्भ मे कोई बात कही तो उसके लिए गोस्वामी तुलसीदास की निन्दा कैसे की जा सकती है। शोले मे गब्बर सिंह कोई डायलग बोले तो उस डायलग को शोले के लेखक का विचार नही कहा जाना चाहिए....

KAVITA RAWAT ने कहा…

Aapki Vyakhaya Bilku sahi hai aur aapki hamari bharitya sanskriti ki dawandol hoti stithi ki chinta karna viajib hai.....ठीक यही हाल हमारा और हमारे भारतीय संस्कृति का हो गया है, समय रहते यदि हमने अपने अस्तित्व कीसच्चाई को नहीं पहचाना तो डायनासोरों कि तरह हम आपस में लड़कर ही अस्तित्वविहीन हो जायेंगे...... aapka sochna prashangik hai ....
Bahut shubhkamnayne

बेनामी ने कहा…

shambook vadh par koi paribhasha nahi likhi aane abhi ta?????

aarya ने कहा…

आदरणीय बेनामी जी
क्षमा करें मूर्खों से मै बहस नहीं करता और ऐसे मूर्खों से तो कतई नहीं तो अपनी पहचान और चेहरा छिपाए फिरते हों. आप कहीं और जाएँ, भगवान आपका भला करे.

बिनोद ने कहा…

अति उत्तम. आशा है आपसे भविष्य में भी मार्गदर्शन मिलता रहेगा
बिनोद

Keshav Shukla ने कहा…

मैं आपकी बात से जरा-सा भी सहमत नहीं हूँ, यहाँ पर ताड़ना शब्द शुध्द दंड के लिए इस्तेमाल हुआ है,
आप प्रसंग देखिये,घटना देखिये, फिर शब्द देखिये,
वहां समुद्र स्वयं को दण्डित करने को सही मान रहा है,और घटना भी तत्कालीन सजा देने की चल रही है,
इसके अलावा,
किष्किन्धा कांड की इस चौपाई का जरा अर्थ बताइये,
"महावृष्टि बहि फूटि किआरी,
जिमि स्वतंत्र होइ बिगरहि नारी.."
लेकिन मुझे आपसे एतराज है, तुलसी से नहीं, किसी को भी व्यक्तिगत सोच रखने का हक़ है,
हाँ थोपने का नहीं है
:)

Keshav Shukla ने कहा…

मैं आपकी बात से जरा-सा भी सहमत नहीं हूँ, यहाँ पर ताड़ना शब्द शुध्द दंड के लिए इस्तेमाल हुआ है,
आप प्रसंग देखिये,घटना देखिये, फिर शब्द देखिये,
वहां समुद्र स्वयं को दण्डित करने को सही मान रहा है,और घटना भी तत्कालीन सजा देने की चल रही है,
इसके अलावा,
किष्किन्धा कांड की इस चौपाई का जरा अर्थ बताइये,
"महावृष्टि बहि फूटि किआरी,
जिमि स्वतंत्र होइ बिगरहि नारी.."
लेकिन मुझे आपसे एतराज है, तुलसी से नहीं, किसी को भी व्यक्तिगत सोच रखने का हक़ है,
हाँ थोपने का नहीं है
:)

B P Shah ने कहा…

ताड़ना पूर्वानुमान सकारात्मक है।
यह नियम ब्राहमण क्षत्रिय वैश्य पर भी लागू होना चाहिए।

नारी ही ताड़ना की अधिकारी क्यों है। पुरुष भी ताड़ना का अधिकारी हो सकता है। अधिकांश राजा रंक बलात्कारी होते हैं। बलात्कारी पुरुष ताड़ना का अधिकारी क्यों नहीं है।

तुलसी ने शम्बूक ऋषि की हत्या को सही क्यों ठहराया है। यह कैंसा पुरुषोत्तम आदर्श है?

B P Shah ने कहा…

ताड़ना पूर्वानुमान सकारात्मक है।
यह नियम ब्राहमण क्षत्रिय वैश्य पर भी लागू होना चाहिए।

नारी ही ताड़ना की अधिकारी क्यों है। पुरुष भी ताड़ना का अधिकारी हो सकता है। अधिकांश राजा रंक बलात्कारी होते हैं। बलात्कारी पुरुष ताड़ना का अधिकारी क्यों नहीं है।

तुलसी ने शम्बूक ऋषि की हत्या को सही क्यों ठहराया है। यह कैंसा पुरुषोत्तम आदर्श है?

Nikhil Singh ने कहा…

वाल्मीकि रामायण में श्री राम चन्द्र जी महाराज द्वारा वनवास काल में निषाद राज द्वारा लाये गए भोजन को ग्रहण करना (बाल कांड 1/37-40) एवं शबर (कोल/भील) जाति की शबरी से बेर खाना (अरण्यक कांड 74/7) यह सिद्ध करता हैं की शुद्र वर्ण से उस काल में कोई भेद भाव नहीं करता था।

श्री रामचंद्र जी महाराज वन में शबरी से मिलने गए। शबरी के विषय में वाल्मीकि मुनि लिखते हैं की वह शबरी सिद्ध जनों से सम्मानित तपस्वनी थी। अरण्यक 74/10

इससे यह सिद्ध होता हैं की शुद्र को रामायण काल में तपस्या करने पर किसी भी प्रकार की कोई रोक नहीं थी।

नारद मुनि वाल्मीकि रामायण (बाल कांड 1/16) में लिखते हैं राम श्रेष्ठ, सबके साथ समान व्यवहार करने वाले और सदा प्रिय दृष्टी वाले हैं।

अब पाठक गन स्वयं विचार करे की श्री राम जी कैसे तपस्या में लीन किसी शुद्र कूल में उत्पन्न हुए शम्बूक की हत्या कैसे कर सकते हैं?

जब वेद , रामायण, महाभारत, उपनिषद्, गीता आदि सभी धर्म शास्त्र शुद्र को तपस्या करने, विद्या ग्रहण से एवं आचरण से ब्राह्मण बनने, समान व्यवहार करने का सन्देश देते हैं तो यह वेद विरोधी कथन तर्क शास्त्र की कसौटी पर असत्य सिद्ध होता हैं।

नारद मुनि का कथन के द्वापर युग में शुद्र का तप करना वर्जित हैं असत्य कथन मात्र हैं।

श्री राम का पुष्पक विमान लेकर शम्बूक को खोजना एक और असत्य कथन हैं क्यूंकि पुष्पक विमान तो श्री राम जी ने अयोध्या वापिस आते ही उसके असली स्वामी कुबेर को लौटा दिया था-सन्दर्भ- युद्ध कांड 127/62

जिस प्रकार किसी भी कर्म को करने से कर्म करने वाले व्यक्ति को ही उसका फल मिलता हैं उसी किसी भी व्यक्ति के तप करने से उस तप का फल उस तप कप करने वाले dव्यक्ति मात्र को मिलेगा इसलिए यह कथन की शम्बूक के तप से ब्राह्मण पुत्र का देहांत हो गया असत्य कथन मात्र हैं।

सत्य यह हैं की मध्य काल में जब वेद विद्या का लोप होने लगा था, उस काल में ब्राह्मण व्यक्ति अपने गुणों से नहीं अपितु अपने जन्म से समझा जाने लगा था, उस काल में जब शुद्र को नीचा समझा जाने लगा था, उस काल में जब नारी को नरक का द्वार समझा जाने लगा था, उस काल में मनु स्मृति में भी वेद विरोधी और जातिवाद का पोषण करने वाले श्लोकों को मिला दिया गया था,उस काल में वाल्मीकि रामायण में भी अशुद्ध पाठ को मिला दिया गया था जिसका नाम उत्तर कांड हैं।

इस प्रकार के असत्य के प्रचार से न केवल अवैदिक विचाधारा को बढावा मिला अपितु श्री राम को जाति विरोधी कहकर कुछ अज्ञानी लोग अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए हिन्दू जाति की बड़ी संख्या को विधर्मी अथवा नास्तिक बनाने में सफल हुए हैं।

इसलिए सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग में सदा तत्पर रहते हुए हमें श्री रामचंद्र जी महाराज के प्रति जो अन्याय करने का विष वमन किया जाता हैं उसका प्रतिकार करना चाहिए तभी राम राज्य को सार्थक और सिद्ध किया जा सकेगा।

Nikhil Singh ने कहा…

वाल्मीकि रामायण में श्री राम चन्द्र जी महाराज द्वारा वनवास काल में निषाद राज द्वारा लाये गए भोजन को ग्रहण करना (बाल कांड 1/37-40) एवं शबर (कोल/भील) जाति की शबरी से बेर खाना (अरण्यक कांड 74/7) यह सिद्ध करता हैं की शुद्र वर्ण से उस काल में कोई भेद भाव नहीं करता था।

श्री रामचंद्र जी महाराज वन में शबरी से मिलने गए। शबरी के विषय में वाल्मीकि मुनि लिखते हैं की वह शबरी सिद्ध जनों से सम्मानित तपस्वनी थी। अरण्यक 74/10

इससे यह सिद्ध होता हैं की शुद्र को रामायण काल में तपस्या करने पर किसी भी प्रकार की कोई रोक नहीं थी।

नारद मुनि वाल्मीकि रामायण (बाल कांड 1/16) में लिखते हैं राम श्रेष्ठ, सबके साथ समान व्यवहार करने वाले और सदा प्रिय दृष्टी वाले हैं।

अब पाठक गन स्वयं विचार करे की श्री राम जी कैसे तपस्या में लीन किसी शुद्र कूल में उत्पन्न हुए शम्बूक की हत्या कैसे कर सकते हैं?

जब वेद , रामायण, महाभारत, उपनिषद्, गीता आदि सभी धर्म शास्त्र शुद्र को तपस्या करने, विद्या ग्रहण से एवं आचरण से ब्राह्मण बनने, समान व्यवहार करने का सन्देश देते हैं तो यह वेद विरोधी कथन तर्क शास्त्र की कसौटी पर असत्य सिद्ध होता हैं।

नारद मुनि का कथन के द्वापर युग में शुद्र का तप करना वर्जित हैं असत्य कथन मात्र हैं।

श्री राम का पुष्पक विमान लेकर शम्बूक को खोजना एक और असत्य कथन हैं क्यूंकि पुष्पक विमान तो श्री राम जी ने अयोध्या वापिस आते ही उसके असली स्वामी कुबेर को लौटा दिया था-सन्दर्भ- युद्ध कांड 127/62

जिस प्रकार किसी भी कर्म को करने से कर्म करने वाले व्यक्ति को ही उसका फल मिलता हैं उसी किसी भी व्यक्ति के तप करने से उस तप का फल उस तप कप करने वाले dव्यक्ति मात्र को मिलेगा इसलिए यह कथन की शम्बूक के तप से ब्राह्मण पुत्र का देहांत हो गया असत्य कथन मात्र हैं।

सत्य यह हैं की मध्य काल में जब वेद विद्या का लोप होने लगा था, उस काल में ब्राह्मण व्यक्ति अपने गुणों से नहीं अपितु अपने जन्म से समझा जाने लगा था, उस काल में जब शुद्र को नीचा समझा जाने लगा था, उस काल में जब नारी को नरक का द्वार समझा जाने लगा था, उस काल में मनु स्मृति में भी वेद विरोधी और जातिवाद का पोषण करने वाले श्लोकों को मिला दिया गया था,उस काल में वाल्मीकि रामायण में भी अशुद्ध पाठ को मिला दिया गया था जिसका नाम उत्तर कांड हैं।

इस प्रकार के असत्य के प्रचार से न केवल अवैदिक विचाधारा को बढावा मिला अपितु श्री राम को जाति विरोधी कहकर कुछ अज्ञानी लोग अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए हिन्दू जाति की बड़ी संख्या को विधर्मी अथवा नास्तिक बनाने में सफल हुए हैं।

इसलिए सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग में सदा तत्पर रहते हुए हमें श्री रामचंद्र जी महाराज के प्रति जो अन्याय करने का विष वमन किया जाता हैं उसका प्रतिकार करना चाहिए तभी राम राज्य को सार्थक और सिद्ध किया जा सकेगा।

ramesh kumar Chaturvedi ने कहा…

वेद सम्मत ग्रन्थोँ के कथ्य का प्रत्येक वर्णं सत्य है श्रद्धा से अवगाहन करना चाहिए ,हीन भावना से कुण्ठित हुइ बुद्धि दोषारोपण से कीलित हो जाती है जो सीमा पर ही रोँक देती है महापुरुषों के चरण रज से अभिषिक्त होने पर ही समाधान होता है .

ramesh kumar Chaturvedi ने कहा…

वेद सम्मत ग्रन्थोँ के कथ्य का प्रत्येक वर्णं सत्य है श्रद्धा से अवगाहन करना चाहिए ,हीन भावना से कुण्ठित हुइ बुद्धि दोषारोपण से कीलित हो जाती है जो सीमा पर ही रोँक देती है महापुरुषों के चरण रज से अभिषिक्त होने पर ही समाधान होता है .

Bhavitavya Arya ने कहा…

यह मिथ्या है कि श्रीराम जी ने सीता जी को वनवास दिया और शम्बूक का वध किया,
यह किसी ने वाल्मीकि रामायण में प्रक्षेप (मिलावट) कर दिया है, जिसके 20 से भी अधिक जबरदस्त प्रमाण हैं, वाल्मीकि रामायण में पूरा उत्तर कांड ही मिलावट है!
जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें:--

राम ने न तो सीता जी को वनवास दिया और न शम्बूक का वध किया

vidyasagar sonkamble ने कहा…

Kyu hamesha kutark karke khudakihi baat sahi thaharaane me lage rahate ho bhai...
.
Spasht rup se samajh raha hai ki kitani jaatiwaadi, ling ke adharpar bhedbhav karnewali panktiya hai ye..kripaya kuchh bhi tark lagake logon ko ullu banana band kijiye..